मंगलवार, 3 सितंबर 2024

विक्रम बेताल कि दिलचस्प कहानियाँ -5 (आधे शरीर वाला ब्राह्मण)

 *विक्रम और बेताल की पाँचवीं कहानी*

* आधे शरीर वाला ब्राह्मण*


प्राचीन समय की बात है, उज्जैन के राजा विक्रमादित्य अपने शौर्य और न्यायप्रियता के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने एक साधु को वचन दिया था कि वे उसके लिए शव लेकर आएंगे।

उस शव में बेताल नाम का एक पिशाच वास करता था। विक्रम ने शव को अपने कंधे पर उठाया और श्मशान की ओर चल पड़े। रास्ते में बेताल ने विक्रम से कहा, "राजा, मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं। यदि तुमने इसका उत्तर दिया, तो मैं फिर से पेड़ पर लौट जाऊंगा। और अगर तुम चुप रहे, तो मैं तुम्हारे साथ रहूंगा।"


बेताल ने कहानी शुरू की:

एक समय की बात है, काशी नगरी में एक ब्राह्मण रहता था जिसका नाम सोमदत्त था। उसके चार पुत्र थे। एक दिन ब्राह्मण की मृत्यु हो गई। उसके पुत्रों ने सोचा कि वे अपनी विद्या का उपयोग करके पिता को पुनर्जीवित करेंगे। 


सभी ने अपनी-अपनी विद्या का प्रयोग किया, लेकिन जब उनके प्रयोग का परिणाम सामने आया, तो उनका पिता दो हिस्सों में बंट गया। एक भाग में सिर और धड़ था, और दूसरे भाग में शेष शरीर था।


                                      


पहला पुत्र कहता है, "मैंने पिता के सिर और धड़ को जीवन दिया। इसलिए, वे मेरे पिता हैं।" दूसरा पुत्र कहता है, "मैंने शेष शरीर को जीवन दिया, इसलिए वे मेरे पिता हैं।" दोनों में विवाद हुआ और वे न्याय के लिए राजा के पास पहुंचे।

राजा ने यह सुना और सोचने लगे कि कौन सही है। 


तभी बेताल ने कहानी समाप्त की और विक्रम से पूछा, "राजा, बताओ कि दोनों में से किसने अपने पिता को पुनर्जीवित किया? अगर तुम सच जानते हुए भी उत्तर नहीं दोगे, तो तुम्हारा सिर फट जाएगा।"

विक्रमादित्य ने उत्तर दिया, "धड़ और सिर ही मुख्य अंग हैं, जिनके बिना कोई जीवित नहीं रह सकता। इसलिए, जिसने धड़ और सिर को जीवन दिया, वही असली पुनर्जीवित करने वाला है।"

जैसे ही विक्रम ने उत्तर दिया, बेताल हंसते हुए शव को छोड़कर फिर से पेड़ पर जाकर लटक गया। विक्रम ने एक बार फिर शव को उठाया और उसे साधु के पास ले जाने के लिए चल पड़े।


इस प्रकार, विक्रम और बेताल की पांचवीं कहानी समाप्त होती है, लेकिन विक्रम का साहस और धैर्य अनवरत बना रहता है।



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