शुक्रवार, 8 अगस्त 2025

गरज और चमक कैसे बनीं

 गरज और चमक कैसे बनीं



एक समय की बात है कि किसी गाँव में एक बहुत सुंदर लड़की रहती थी। उसके लंबे और काले केश थे. आँखें चमकदार और शरीर की रंगत सुनहरी थी। गाँव के सभी लड़के उससे प्रेम करते और उससे विवाह करना चाहते थे, लेकिन जैसे ही वे उसके पास आते वह उन पर हँसती हुई बहुत दूर भाग जाती। वह इतना तेज भागती थी कि उसे पकड़ना किसी के लिए भी असंभव था।

उस गाँव में लक्ष्मण नामक एक युवक भी रहता था। वह किसी अन्य गाँव से आया था। दूसरे युवकों की तरह वह भी उस लड़की की सुंदरता पर मोहित था। लड़की को वह अपनी जान से ज़्यादा चाहता था। एक बार वह उसके पिता के पास गया और लड़की का हाथ शादी के लिए माँगा। लड़की के पिता ने उससे कहा, "अगर तुम मेरे घर बारह वर्ष तक नौकर की तरह काम कर सकते हो, तो मेरी लड़की से शादी कर सकोगे।"

लक्ष्मण लड़की को बेहद चाहता था। वह उसके घर नौकर की हैसियत से काम करने लगा। धीरे-धीरे बारह साल बीत गए। लक्ष्मण अपने मालिक के पास गया और कहा, "मालिक, मैं आपके घर बारह साल काम कर चुका हूँ। आपने मुझे बारह साल बाद एक तोहफा देने का वचन दिया था। अब मैं वह तोहफा लेकर अपने घर जाऊँगा।"

उसका मालिक घर के एक कमरे से एक बहुत बड़ी गागर उठाकर लाया। गागर ढक्कन से अच्छी तरह ढकी हुई थी। मालिक ने गागर उसे सुपुर्द करते हुए बोला, "बेटा, इसे ले जाओ।" फिर कहा, "इसे केवल अपने घर जाकर ही खोलना। जैसा मैं कह रहा हूँ, बिलकुल वैसे ही गरज और चमक कैसे बनीं?

करना। नौकरी के दौरान तुमने मेरा हर कहा माना है। घर जाते ही तुझे तेरा तोहफा मिल जाएगा और सब ठीक होगा।"

लक्ष्मण ने मालिक से गागर ली और सिर पर उठाकर खुशी-खुशी अपने घर को चल दिया। घर तक का सफर लंबा था। उसे जंगल से होकर गुजरना था। वह अकेला था। अतः जल्दी-से-जल्दी सफर पूरा करना चाहता था। गागर में क्या होगा-यह देखने के लिए वह बड़ा उतावला हो रहा था, लेकिन उसे अपना वायदा याद आता और वह आगे बढ़ता जाता। अँधेरा होने से पहले वह घर पहुँचना चाहता था। 'घर जाऊँगा तभी मैं ढक्कन खोलूँगा। बारह साल तक मैंने वही किया, जो मालिक ने चाहा।' वह अपने आप से बातें करते हुए चला जा रहा था।

दोपहर को धूप तेज हो गई थी। गरमी के मारे लक्ष्मण का बुरा हाल हो रहा था। हर कदम पर गागर भी पहले से भारी लगने लगी थी। उसे यों लगा, मानो गागर में से कुछ आवाजें आ रही हों। वह सोचने लगा-'गागर में क्या हो सकता है? क्या इसमें मेरे मालिक की लड़की, मेरी जीवन-संगिनी है? पर नहीं। मेरे मालिक ने मुझे गागर में झाँकने को मना किया है। शीघ्र ही में घर पहुँच जाऊँगा और सब पता चल जाएगा।'

अब वह जंगल में तेज-तेज चलने लगा। गागर के बारे में भूलने के लिए कभी वह पक्षियों को देखता और कभी पेड़-पौधों को। लेकिन गागर उसके सिर पर भारी हो रही थी। 'मेरा ख़याल है कि मेरे मालिक की सुंदर लड़की इसमें ही है।' वह सोच रहा था। धीरे-धीरे अँधेरा भी गहराने लगा। 'सौ कदम चलकर मैं घर पहुँच जाऊँगा। क्या मैं गागर में हलका-सा झाँककर देख लूँ! झाँकने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मैं तुरंत ही उसे बंद कर दूँगा।' उसने सोचा। वह एक पत्थर पर बैठ गया और गागर अपने सामने रख ली। उसे महसूस हुआ कि वह एक लड़की के हँसने की आवाज सुन रहा है। यह बहुत ही मीठी और प्यारी आवाज थी। उसकी धड़कन तेज होती जा रही थी।

"मैं इसे खोलकर केवल झाकूँगा" यह कहते हुए लक्ष्मण ने गागर का ढक्कन थोड़ा ऊँचा करके उसमें झाँका। जैसे ही उसने ऐसा किया, ढक्कन उड़कर उसके चेहरे पर आ लगा। एक पल को उसकी आँखें बंद हो गईं।



जब उसने आँखें खोलीं तो एक लड़की रूपी बहुत तेज चमक आसमान में उड़कर जाती दिखी। वह उसकी पहुँच के बाहर, बहुत दूर, आकाश में बड़ी तेजी से चमक रही थी। लक्ष्मण ने ऐसी गलती कर दी, जिसके लिए उसके मालिक ने मना किया था। अपने सपनों की रानी को उसने सदा-सदा के लिए खो दिया।

"लौट आ, लौट आ!" जंगल में खड़ा वह चिल्लाए जा रहा था। आकाश की ओर लक्ष्मण ने बहुत सारे तीर भी चलाए, पर तीर केवल बादलों से ही टकराते रहे। लड़की उसकी ओर हँसती हुई देखती अपने चमकते हुए सफेद दाँत ही दिखाए जा रही थी।

"गरज को सुनो!" लोग बादलों की गर्जन को सुनकर अकसर कहते हैं- "ये लक्ष्मण के तीरों की बादलों से टकराने की आवाज है।" जब वे आकाश में बिजली चमकते हुए देखते हैं तो कहते हैं- "ये उसके मालिक की सुंदर लड़की है, जो उसके थोड़े-से उतावलेपन के कारण उसकी पत्नी नहीं बन सकी थी।"

वह आज भी उतनी ही सुंदर है, जितनी कि पहले थी। आज तक उसे कोई भी पकड़ नहीं सका। जब वह आसमान में चमकती है, हम-आप लक्ष्मण के तीरों की आवाज सुन सकते हैं। लेकिन वे तीर कभी उसकी बिछुड़ चुकी दुल्हन के पास नहीं पहुँच सके।

बुधवार, 6 अगस्त 2025

हीरो से भरा खेत

 हीरो से भरा खेत



हाफिज अफ्रीका का एक किसान था। वह अपनी जिन्दगी से खुश और संतुष्ट था। हाफिज खुश इसलिए था क्योंकि वह संतुष्ट था। वह संतुष्ट इसलिए था क्योंकि वह खुश था।


एक दिन एक अक्लमन्द आदमी उसके पास आया और हाफिज़ को हीरों के महत्व और उनसे जुड़ी ताकत के बारे में बताया। उसने हाफिज से कहा-अगर तुम्हारे पास अंगूठे जीतना भी बड़ा हीरा हो तो तुम पूरा शहर खरीद सकते हो।


और अगर तुम्हारे पास मुट्ठी जीतना बड़ा हीरा हो तो तुम अपने लिये शायद पूरा देश ही खरीद लो। वह अक्लमंद आदमी इतना कहकर वहाँ से चला गया। उस रात हाफिज सो नहीं सका। वह असंतुष्ट हो चुका था इसलिए उसकी खुशी भी खत्म हो चुकी थी।


दूसरे दिन सुबह होते ही हाफिज़ ने अपने खेतों को बेंचने और अपने परिवार की देखभाल का इंतजाम किया और हीरे खोजने के लिए रवाना हो गया। वह हीरो की खोज में पूरे अफ्रीका में भटकता रहा पर उन्हें पा ना सका।


उसने उन्हें यूरोप में भी ढूँढ़ा पर वे उसे वहाँ भी नहीं मिले। स्पेन पहुँचते पहुँचते वह मानसिक, शारीरिक और आर्थिक स्तर पर पूरी तरह टूट चुका था। वह इतना मायूस हो चुका था कि उसने बार्सिलोना नदी में कूदकर खुदकुशी कर ली।


इधर जिस आदमी ने हाफिज़ के खेत खरीदे थे वह एक दिन उन खेतों से होकर बहने वाले नालों में अपने ऊँटों को पानी पिला रहा था तभी सुबह के वक्त उग रहे सूरज की किरणें नाले के दूसरी ओर पड़े एक पत्थर पर पड़ी और वह इंद्र धनुष की तरह जगमगा उठा।


यह सोचकर की वह पत्थर उसकी बैठक में अच्छा दिखेगा उसने उसे उठा कर अपनी बैठक कक्ष में सजा दिया। उस दिन दोपहर में हाफिज को हीरों के बारे में बताने वाला आदमी खेतों के इस नए मालिक के पास आया, उसने उस जगमगाते हुए पत्थर को देखा पूछा क्या हाफिज लौट आया? उस आदमी ने जवाब दिया नहीं लेकिन आपने यह सवाल क्यों पूछा? अक्लमन्द आदमी ने जवाब दिया क्योंकि यह हीरा है, मैं उन्हें देखते ही पहचान जाता हूँ। नए मालिक ने कहा नहीं यह तो महज एक पत्थर है, मैंने उसे नाले के पास से उठाया है। चलिए मैं आपको दिखाता हूँ, वहाँ ऐसे बहुत सारे पत्थर पड़े हुए हैं।


उन्होंने वहाँ से बहुत सारे पत्थर उठाए और उन्हें जांचने परखने के लिए भेज दिया। वे पत्थर हीरे ही साबित हुए। उन्होने पाया कि उस खेत में दूर दूर तक हीरे दबे हुए थे।


जब हमारा नजरिया सही होता है, तो हमें महसूस होता है कि हम हीरों से बनी हुई जमीन पर चल रहे हैं। मौके हमेशा हमारे पांव तले दबे हुए होते हैं और इसके लिए हमको उन्हें खोजने कहीं जाना नहीं है, वह खुद हमारे पास हैं, जरूरत है तो बस उस नजरिये की जो उन्हें पहचान सके।


लेकिन हमें तो दूसरे के खेत की घास हमेशा हरी लगती है। हमें भगवान चाहे जितना दे दे, हमारी ललचाने की आदत कभी नहीं छूटती। इसी प्रकार दूसरे हमारे पास मौजूद चीजों को देखकर ललचाते रहते हैं। हमेशा अपनी जगह की अदला बदली करने की जगह हासिल करने पर उन्हें खुशी होती है।


हमें इस कहानी से बहुत ही अच्छी सीख तो यह मिलती है कि जिस जोश, जुनून और सकारात्मकता को पाने के लिए हम, सेमिनार करते हैं वह हमारे खुद के अंदर है। जी हाँ! आप चाहे जितनी किताबें पढ़ लें, लेकिन जब तक आप अपने आपको नहीं पढ़ेंगे, समझेंगे तब तक सब किताबें व्यर्थ हैं। 


गरज और चमक कैसे बनीं

  गरज और चमक कैसे बनीं एक समय की बात है कि किसी गाँव में एक बहुत सुंदर लड़की रहती थी। उसके लंबे और काले केश थे. आँखें चमकदार और शरीर की रंगत...