सोमवार, 9 सितंबर 2024

विक्रम बेताल कि दिलचस्प कहानियाँ -6 (सती स्त्री का बलिदान)

 *विक्रम और बेताल की छठी कहानी*

          *सती स्त्री का बलिदान*


एक बार की बात है, उज्जैन के राजा विक्रमादित्य बेताल को पकड़कर लाने के लिए श्मशान घाट गए। बेताल पेड़ से उतरकर उनके कंधे पर बैठ गया और रास्ते में कहानी सुनाने लगा।


कहानी इस प्रकार थी:

प्राचीन काल में एक नगर में राजा धर्मध्वज राज्य करता था। उस राज्य में एक ब्राह्मण परिवार था, जिसमें ब्राह्मण देवशर्मा अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू के साथ रहता था। ब्राह्मण के पुत्र का नाम हरिस्वामी था और उसकी पत्नी का नाम थी मदनसुंदरी। मदनसुंदरी बहुत ही सती और पतिव्रता स्त्री थी।



कुछ समय बाद हरिस्वामी की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु से मदनसुंदरी बहुत दुखी हुई, लेकिन उसने अपना सतीत्व नहीं छोड़ा। उसने दृढ़ संकल्प किया कि वह अपने पति के साथ सती होगी। समाज और परिवार के लोग उसे समझाने लगे कि वह अपने जीवन की ओर ध्यान दे, लेकिन उसने किसी की नहीं सुनी।


मदनसुंदरी अपने पति के शव के साथ श्मशान गई और वहां चिता पर चढ़ने की तैयारी करने लगी। तभी वहां एक देवता प्रकट हुए और बोले, "हे सती स्त्री, तुम इतनी पवित्र हो कि मैं तुम्हें एक वरदान देना चाहता हूँ।"

मदनसुंदरी ने कहा, "यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, तो मेरे पति को जीवित कर दीजिए।"


देवता ने हरिस्वामी को जीवित कर दिया। दोनों खुशी-खुशी घर लौट आए और सुखपूर्वक जीवन बिताने लगे।

यहां तक कहानी सुनाने के बाद बेताल ने राजा विक्रम से प्रश्न पूछा, "राजन, बताओ, क्या मदनसुंदरी का निर्णय सही था? क्या उसने सही किया कि उसने अपने जीवन को त्यागने का निर्णय लिया?"


राजा विक्रमादित्य ने जवाब दिया, "मदनसुंदरी का निर्णय सतीत्व के प्रति उसकी श्रद्धा और पतिव्रता धर्म पर आधारित था, लेकिन उसका निर्णय केवल व्यक्तिगत नहीं था। यदि वह अपने पति के पुनर्जीवन की कामना नहीं करती, तो उसके परिवार को भी कष्ट होता। उसने अपने धर्म का पालन करते हुए सही निर्णय लिया और समाज के कल्याण का भी ध्यान रखा।"



राजा का सही उत्तर सुनकर बेताल फिर से पेड़ पर उड़ गया और विक्रम को उसे फिर से पकड़ने के लिए लौटना पड़ा। 


इस प्रकार छठी कहानी समाप्त होती है।

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