*विक्रम बेताल की चौथी कहानी*
*ब्राह्मण और संन्यासी*
प्राचीन समय की बात है। उज्जयिनी नगर में एक धर्मात्मा और नीतिवान ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी भी बड़ी सती और पतिव्रता थी। एक दिन, वह ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ यात्रा पर निकला। यात्रा के दौरान, उन्हें रास्ते में एक संन्यासी मिला। संन्यासी ने उन दोनों को अपने पास बुलाया और कहा, "तुम दोनों बहुत धर्मात्मा लगते हो। मेरी इच्छा है कि तुम मेरी सेवा में कुछ समय बिताओ।"
ब्राह्मण और उसकी पत्नी ने सोचा कि संन्यासी की सेवा करने से उन्हें पुण्य मिलेगा। इसलिए वे संन्यासी के साथ चल दिए और उसकी सेवा करने लगे। कुछ दिन बीतने के बाद, संन्यासी ने ब्राह्मण से कहा, "तुम्हारी पत्नी बहुत ही सुंदर और पतिव्रता है। मेरी साधना में बहुत शक्ति है। यदि तुम चाहो तो मैं तुम्हारी पत्नी को और भी सुंदर और चिरयुवा बना सकता हूँ।"
ब्राह्मण यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने संन्यासी से कहा कि वह यह वरदान स्वीकार करेगा। संन्यासी ने ब्राह्मण की पत्नी को एक विशेष औषधि दी और कहा, "इस औषधि को लेने के बाद तुम्हारी पत्नी कभी बूढ़ी नहीं होगी और हमेशा जवान बनी रहेगी।"
ब्राह्मण और उसकी पत्नी ने संन्यासी की बात मान ली। लेकिन, उस संन्यासी के मन में दुष्टता थी। उसने सोचा कि जब यह स्त्री हमेशा जवान रहेगी, तो वह मेरी हो जाएगी। उसने एक योजना बनाई और ब्राह्मण को धोखा देने की सोची।
एक दिन, संन्यासी ने ब्राह्मण को एक गहरे जंगल में ले जाकर कहा, "इस जंगल में एक ऐसा वृक्ष है जो तुम्हारी सभी इच्छाओं को पूर्ण कर सकता है। अगर तुम उस वृक्ष की पूजा करोगे, तो तुम्हें अपार धन, वैभव और सुख मिलेगा।"
ब्राह्मण उस वृक्ष की पूजा करने लगा और उसी समय संन्यासी ने एक मंत्र पढ़कर उसे अचेत कर दिया। संन्यासी ने सोचा कि अब ब्राह्मण की पत्नी मेरी हो जाएगी।
वह ब्राह्मण की पत्नी के पास पहुंचा और उसे झूठी बातें बताने लगा कि तुम्हारा पति अब इस संसार में नहीं रहा, इसलिए तुम अब मेरे साथ रह सकती हो।
लेकिन ब्राह्मण की पत्नी बहुत ही चतुर और सती थी। उसने संन्यासी की बातों पर विश्वास नहीं किया। उसने संन्यासी से कहा, "यदि मेरे पति नहीं रहे, तो मैं भी उनके साथ सती हो जाऊंगी।"
यह सुनकर संन्यासी भयभीत हो गया और उसने सारा सच उगल दिया। उसने ब्राह्मण को होश में ला दिया और उनसे माफी मांगी। ब्राह्मण ने संन्यासी को माफ कर दिया और फिर अपनी पत्नी के साथ घर लौट आया।
यह कहानी सुनाने के बाद बेताल ने विक्रम से पूछा, "राजन! बताओ, इस कहानी में कौन सही था और कौन गलत? ब्राह्मण ने संन्यासी को माफ करके सही किया या गलत?"
विक्रम ने उत्तर दिया, "ब्राह्मण ने संन्यासी को माफ करके अपनी महानता और धैर्य का परिचय दिया। संन्यासी गलत था, लेकिन ब्राह्मण का उसे माफ करना उसकी उदारता को दर्शाता है।"
यह सुनकर बेताल फिर से पेड़ पर लटक गया, और विक्रम को उसे पकड़कर वापस लाने के लिए मजबूर होना पड़ा।





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