*विक्रम बेताल की कहानी नंबर - 2*
"महारानी का वचन"
एक बार की बात है, राजा विक्रमादित्य ने अपने वचन के अनुसार बेताल को पकड़ लिया और उसे कंधे पर डालकर श्मशान की ओर चलने लगे।
बहुत समय पहले की बात है। उज्जैन नगर में वीरसेन नाम का एक राजा राज करता था। उसकी एक बहुत ही सुंदर और बुद्धिमान रानी थी, जिसका नाम मृगनयनी था।
एक दिन, राजा वीरसेन शिकार पर निकला। वहां उसे एक घायल नागिन मिली।
कुछ समय बाद, रानी मृगनयनी ने एक अद्भुत सपना देखा। उसने देखा कि एक सुंदर युवा राजकुमार उसकी गोद में खेल रहा है। जब वह जागी, उसने राजा से उस सपने के बारे में बताया और कहा, "राजन, मुझे वह बालक चाहिए।"
राजा ने नागिन को याद किया और उसे बुलाया। नागिन ने राजा की बात सुनी और कहा,
"राजन, मैं आपके तीन वरदानों में से यह पहला वरदान पूरा करती हूँ।" यह कहकर उसने रानी की गोद में एक सुंदर बालक रख दिया।
राजा और रानी बहुत प्रसन्न हुए। लेकिन उस बालक के जन्म के साथ ही एक कठिनाई उत्पन्न हो गई। दरअसल, वह बालक एक शर्त के साथ आया था। अगर वह बालक कभी भी किसी और की गोद में जाता, तो उसे उसी समय लौट जाना पड़ता।
राजा और रानी ने यह बात सुनकर फैसला किया कि वह बालक केवल रानी की गोद में ही रहेगा। लेकिन एक दिन, बालक खेलते-खेलते महल के बगीचे में चला गया और वहां की एक दासी ने उसे अपनी गोद में उठा लिया। उसी समय वह बालक गायब हो गया।
रानी मृगनयनी बहुत दुखी हुई और उसने अपने जीवन को समाप्त करने का निश्चय किया। लेकिन तभी नागिन प्रकट हुई और रानी को समझाया कि बालक का लौटना अवश्यंभावी था, क्योंकि यह उसकी किस्मत में लिखा था।
रानी ने नागिन से माफी मांगी और कहा, "मैंने अपने वचन का पालन नहीं कर पाई।" नागिन ने रानी को धैर्य बंधाया और उसे समझाया कि कुछ बातें हमारे नियंत्रण में नहीं होतीं।
इतना कहकर बेताल ने राजा विक्रम से पूछा, "हे राजन, बताओ, रानी मृगनयनी ने अपने जीवन को समाप्त करने का निश्चय क्यों किया? क्या उसका निर्णय सही था?"
राजा विक्रम ने उत्तर दिया, "रानी मृगनयनी का निर्णय गलत था। किसी भी परिस्थिति में जीवन को समाप्त करना सही नहीं है। जीवन अमूल्य है, और हमें उसे हर हाल में संजोकर रखना चाहिए। रानी ने अपने वचन को अत्यधिक गंभीरता से लिया, लेकिन उसे समझना चाहिए था कि कुछ बातें हमारे हाथ में नहीं होतीं।"
जैसे ही राजा ने सही उत्तर दिया, बेताल फिर से गायब हो गया और पेड़ पर जाकर लटक गया। राजा विक्रमादित्य को उसे फिर से पकड़ने के लिए वापस जाना पड़ा।
*कहानी समाप्त।*





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