पिशाच का प्रकोप
पिशाच की डरावनी आँखें चारों दोस्तों पर गड़ी थीं। उसकी लंबी, तीखी उंगलियाँ हवा में लहराईं, और महल के चारों ओर एक भयानक गरजने की आवाज़ गूंज उठी। अर्जुन ने जल्दी से पास पड़ी एक लकड़ी उठाई और उसे आगे कर दिया, लेकिन पिशाच ज़ोर से हँसा।
"तुम्हारी यह छोटी चालें मुझ पर असर नहीं करेंगी," उसने गरजते हुए कहा।
रीना ने कांपती आवाज़ में कहा, "हमें कुछ करना होगा, वरना हम बच नहीं पाएंगे।" तभी विवेक को याद आया कि उन्होंने एक किताब में पढ़ा था कि पिशाचों को पवित्र जल से मारा जा सकता है।
"हमारे पास कोई पवित्र जल नहीं है, लेकिन समुद्र का पानी हो सकता है कि इसे नुकसान पहुँचा सके!" विवेक ने कहा।
चारों ने तेजी से महल का रास्ता खोजने की कोशिश की, लेकिन पिशाच हवा में उड़कर उनके सामने आ गया। "कोई नहीं बच सकता!" उसने भयानक आवाज़ में कहा।
अर्जुन ने हिम्मत करके एक टॉर्च को उसके चेहरे पर फेंक दिया। पिशाच चिल्लाया और पीछे हट गया। "रोशनी...! इसे रोशनी से डर लगता है!" कविता चिल्लाई।
चारों ने अपनी टॉर्च जलाकर उसे घेर लिया। पिशाच बुरी तरह तड़पने लगा। लेकिन क्या यह उसे मारने के लिए काफी था? या कोई और रहस्य छिपा था?
"नेक्स्ट भाग में और भी दिलचस्प मोड़ आने वाले हैं! आज का भाग कैसा लगा? अपनी राय कॉमेंट में ज़रूर बताएं।

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